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इब्तिदा-ए-इश्क़

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मासूम आशिक़ की मोहब्बत तो यूं ही तमाम हो गई बात दिल से निकली भी नहीं और चर्चा सरेआम हो गई दाग़-ए-इल्ज़ाम मेरे दामन में लगता तो मंज़ूर था लेकिन पहली मुलाकात भी न हुई अभी और वो बदनाम हो गई मोहब्बत की कशिश बड़ी गहरी है, रुसवाइयों से क्या फ़ना होती उन आंखों की मयकदे में कैद फिर एक और हसीन शाम हो गई माना इस इब्तिदा-ए-इश्क़ में ख़ुद को बर्बाद कर लिया हमने ख़ाक तो जिंदगी यूं भी होती, नसीब कि मय-ए-गुलफ़ाम हो गई - Rakesh