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साँसों की आवारगी

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हर ख्वाहिश ने मुझसे अपनी क़ीमत माँगी हर ख़्वाब ने अपने हिस्से की ज़िंदगी चाही  चंद लम्हों की गुज़ारिश थी वक़्त से लेकिन साँसों की आवारगी में ये ज़िंदगी गुज़र गई

निगाहे-यार

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ये ज़िंदगी का कौन सा नया मुक़ाम है  ये चढ़ रहा है कौन सा ख़ुमार आजकल ख़ुद को संवारता हूँ बड़े इत्मीनान से  चलता हूँ घर से हो कर तैयार आजकल   मौसम की शरारत है या कुछ और राज़ है  फिर से महक रही है बयार आजकल कहता नहीं हूँ लेकिन हैरत में हूँ ज़रूर  दिखने लगे हैं लोग ख़ुश-गवार आजकल सीने में सांस उतरी है कई मुद्दतों के बाद  होने लगा है ज़िंदगी से प्यार आजकल  आशिक़-ए-मज़बूर का मुक़द्दर तो नहीं था    शायद बदल गई  है  निगाहे-यार  आजकल  - Rakaesh