निगाहे-यार
ये ज़िंदगी का कौन सा नया मुक़ाम हैये चढ़ रहा है कौन सा ख़ुमार आजकलख़ुद को संवारता हूँ बड़े इत्मीनान सेचलता हूँ घर से हो कर तैयार आजकलमौसम की शरारत है या कुछ और राज़ हैफिर से महक रही है बयार आजकलकहता नहीं हूँ लेकिन हैरत में हूँ ज़रूरदिखने लगे हैं लोग ख़ुश-गवार आजकलसीने में सांस उतरी है कई मुद्दतों के बादहोने लगा है ज़िंदगी से प्यार आजकलआशिक़-ए-मज़बूर का मुक़द्दर तो नहीं थाशायद बदल गई है निगाहे-यार आजकल
- Rakaesh
Comments
Post a Comment