जज़्बात रिश्तों के

वो रूठे हैं तो इतना भी तकल्लुफ क्या मनाने मेंनिगाह-ए-उम्र लग जाती है रिश्तों को निभाने मेंछुपा के रख दिले-ग़ुस्ताख़ के ख़ुदगर्ज़ लफ़्ज़ों कोग़लतफ़हमी की मोहलत अब नहीं मिलती ज़माने मेंकिसे राहत है शिकवों से कहाँ हासिल सुकूँ पलभरजो ख़ुद से है ख़फ़ा वो औरों को लगे हैं आज़माने मेंनहीं है इल्म उनको दिल की इस संगीन हालत कामिटे है हम ख़याल-ए-इश्क़ की महफ़िल सजाने मेंहमे कब शौक़ था कट जाए अपनी ज़िंदगी तनहाजवानी ढल गई अफ़सोस बस नज़दीक आने मेंमोहब्बत में फ़ना होने का इक अंदाज़-ए-जीनत हैज़र-ए-ख़ुश्बू नहीं मिलती इश्क़ के हर फ़साने में
- राकेश


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