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साँसों की आवारगी

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हर ख्वाहिश ने मुझसे अपनी क़ीमत माँगी हर ख़्वाब ने अपने हिस्से की ज़िंदगी चाही  चंद लम्हों की गुज़ारिश थी वक़्त से लेकिन साँसों की आवारगी में ये ज़िंदगी गुज़र गई

निगाहे-यार

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ये ज़िंदगी का कौन सा नया मुक़ाम है  ये चढ़ रहा है कौन सा ख़ुमार आजकल ख़ुद को संवारता हूँ बड़े इत्मीनान से  चलता हूँ घर से हो कर तैयार आजकल   मौसम की शरारत है या कुछ और राज़ है  फिर से महक रही है बयार आजकल कहता नहीं हूँ लेकिन हैरत में हूँ ज़रूर  दिखने लगे हैं लोग ख़ुश-गवार आजकल सीने में सांस उतरी है कई मुद्दतों के बाद  होने लगा है ज़िंदगी से प्यार आजकल  आशिक़-ए-मज़बूर का मुक़द्दर तो नहीं था    शायद बदल गई  है  निगाहे-यार  आजकल  - Rakaesh 

ज़िन्दगी का नशा

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  बात ये नहीं है कि तुम्हें पीते  हुए  देखा किसने  तुम्हारी हरकतें कहती हैं कि पीते ज़रूर हो तुम  लोग यूँ ही नहीं करते हैं तुम्हारे नाम के चर्चे  हमारी महफ़िलों में आजकल मशहूर हो तुम हुए बदनाम क्यूँ तुम इस क़दर दुनिया की नज़रों में  बड़ा मुश्क़िल है कहना मय क़दों से दूर हो तुम  चलो माना नहीं हो मय-कशो की भीड़ में शामिल  कुछ तो है जिसके नशे में बे-सबब से चूर हो तुम           - Rakesh 

जज़्बात रिश्तों के

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वो रूठे हैं तो इतना भी तकल्लुफ क्या मनाने में निगाह-ए-उम्र लग जाती है रिश्तों को निभाने में छुपा के रख दिले-ग़ुस्ताख़ के ख़ुदगर्ज़ लफ़्ज़ों को ग़लतफ़हमी की मोहलत अब नहीं मिलती ज़माने में किसे राहत है शिकवों से कहाँ हासिल सुकूँ पलभर जो ख़ुद से है ख़फ़ा वो औरों को लगे हैं आज़माने में नहीं है इल्म उनको दिल की इस संगीन हालत का मिटे है हम ख़याल-ए-इश्क़ की महफ़िल सजाने में हमे कब शौक़ था कट जाए अपनी ज़िंदगी तनहा जवानी ढल गई अफ़सोस बस नज़दीक आने में मोहब्बत में फ़ना होने का इक अंदाज़-ए-जीनत है ज़र-ए-ख़ुश्बू नहीं मिलती इश्क़ के हर फ़साने में                               - राकेश 

खुला निमंत्रण मुक्त गगन का

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मन की खींची रेखाओं के चक्रव्यूह में उलझा जीवन आशाओं का बोझ बहुत है पर झुकना स्वीकार नही है कितने भी डग मग पग डोलें, लोग भले अब कुछ भी बोलें खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है। प्रतिबिम्बों के कोलाहल से इच्छाओं के दावानल तक बीत गए दिन माह वर्ष सब, आवाजों का पीछा करते भूख जल गयी लगन की लौ में, प्यास गंवाई कौतूहल में स्वप्नों की अविरल हलचल में, सुबह हो गयी जगते जगते एक नहीं सौ बार गिरूं, फिर भी कदमों की हार नहीं है खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है। स्मृतियों पे धूल चढ़ गयी, हुए रात दिन एक सरीखे बाट जोह के थक गए साथी, चले गए सब अपने रस्ते आँख मूँद के खूब बटोरे, स्वर्ण तंतु के सुन्दर जाले बना सुनहरे महल दुमहले, बंधक हो गए हँसते हँसते जहाँ रहे स्वछन्द सुखी मन, क्यों ऐसा संसार नहीं है खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है। घड़ी के कांटे चला रहे हैं जीवन के हर पल पल की गति, कर्मयज्ञ की बलि वेदी पर, चढ़ा दिए आहुति में सब क्षण सब कुछ पा लेने के हठ में क्या  क्या   खोया  अब समझे हैं  ज्ञान समझ कर जितना सीखा, उतना मैला हो गया द...

स्वच्छंद चेतना का प्रकाश

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चित शून्य व्योम में बैठ सतत गिन रहा कोई सबकी साँसे             अनभिज्ञ सभी हैं न जाने कब रुक जाएँ किसकी साँसें जो कुछ है मिला सब खर्च यहीं कर कर्मभूमि से है जाना पर चूक न हो चैतन्य रहे न व्यर्थ में कुछ भी लुटवाना भ्रम स्वयं की छाया से होगा  और  छल अंधियारों के पीछे मत कभी सींचना वो विचार,  दुखते घावों को जो सींचे दुर्लभ है जीवन का उत्सव, जी भर हँसना जी भर गाना बस रहे चेतना इतनी कि, इस स्वांग में सत्य न बिसराना उसे अंधभक्ति में न बांधो, मत कैद करो दीवालों में न मंदिर में, न मस्जिद में, न गिरिजाघर के तालों में मत करो पराया उसको जो, कण कण में सदा समाया है वह मुक्त तुम्हारे अंदर है, ये रूप उसी की छाया है मत ढक देना जड़ चिंतन से, स्वच्छंद चेतना का प्रकाश माया से मन को मुक्त करो, फिर सत्य दिखेगा अनायास - Rakesh

वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो

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photo credit: vecteezy सच्चाई का जुनूं है तो बेहतर अकेले चलना सीख लो ज़िंदगी इबादत की आग है बेख़ौफ़ जलना सीख लो गुजर चुके लम्हों में दिल की धड़कनें ना क़ैद हो जायें ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो  ना तुम रुकना चाहते हो ना हमे ठहरने का शौक़ है मगर कहीं तो ये क़ाफ़िला रुकेगा एक दिन आहिस्ता आहिस्ता भला कब तक रहेगी आसमाँ में रोशनी की चकाचौंध कभी ना कभी तो दिन ढल जाएगा, आहिस्ता आहिस्ता ये ज़िद किस काम की अब उतर के आ जाओ जमीं पर एक खूबसूरत शाम की तरह तुम भी ढलना सीख लो ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो  वक़्त के सैलाब में बिखरते रिश्तों की अहमियत देख ली दरवाज़ा खटखटाने वालों की नीयत देख ली गले में उतरते नमकीन आंसू तो कभी दिखायी नहीं देते मगर दिखने वाली मुस्कुराहटों की असलियत देख ली इससे पहले कि दफ़्न हो जाएं जज़्बात इन चहार दीवारियों में दुनिया तुम्हारी है ऐ दोस्त, घर से बाहर निकलना सीख लो ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो  आख़िर ये तक़दीर बदलने की इतनी जद्दोज़हद क्या है ख़ुद से पूछो तो कभी तुम्हारे जुनूं की आख़िर हद क्य...