स्वच्छंद चेतना का प्रकाश

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चित शून्य व्योम में बैठ सतत गिन रहा कोई सबकी साँसे            
अनभिज्ञ सभी हैं न जाने कब रुक जाएँ किसकी साँसें
जो कुछ है मिला सब खर्च यहीं कर कर्मभूमि से है जाना
पर चूक न हो चैतन्य रहे न व्यर्थ में कुछ भी लुटवाना

भ्रम स्वयं की छाया से होगा 
और छल अंधियारों के पीछे
मत कभी सींचना वो विचार, दुखते घावों को जो सींचे
दुर्लभ है जीवन का उत्सव, जी भर हँसना जी भर गाना
बस रहे चेतना इतनी कि, इस स्वांग में सत्य न बिसराना

उसे अंधभक्ति में न बांधो, मत कैद करो दीवालों में
न मंदिर में, न मस्जिद में, न गिरिजाघर के तालों में
मत करो पराया उसको जो, कण कण में सदा समाया है
वह मुक्त तुम्हारे अंदर है, ये रूप उसी की छाया है
मत ढक देना जड़ चिंतन से, स्वच्छंद चेतना का प्रकाश
माया से मन को मुक्त करो, फिर सत्य दिखेगा अनायास

- Rakesh

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