खुला निमंत्रण मुक्त गगन का




मन की खींची रेखाओं के चक्रव्यूह में उलझा जीवन
आशाओं का बोझ बहुत है पर झुकना स्वीकार नही है
कितने भी डग मग पग डोलें, लोग भले अब कुछ भी बोलें
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।

प्रतिबिम्बों के कोलाहल से इच्छाओं के दावानल तक
बीत गए दिन माह वर्ष सब, आवाजों का पीछा करते
भूख जल गयी लगन की लौ में, प्यास गंवाई कौतूहल में
स्वप्नों की अविरल हलचल में, सुबह हो गयी जगते जगते
एक नहीं सौ बार गिरूं, फिर भी कदमों की हार नहीं है
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।

स्मृतियों पे धूल चढ़ गयी, हुए रात दिन एक सरीखे
बाट जोह के थक गए साथी, चले गए सब अपने रस्ते
आँख मूँद के खूब बटोरे, स्वर्ण तंतु के सुन्दर जाले
बना सुनहरे महल दुमहले, बंधक हो गए हँसते हँसते
जहाँ रहे स्वछन्द सुखी मन, क्यों ऐसा संसार नहीं है
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।

घड़ी के कांटे चला रहे हैं जीवन के हर पल पल की गति,
कर्मयज्ञ की बलि वेदी पर, चढ़ा दिए आहुति में सब क्षण
सब कुछ पा लेने के हठ में क्या क्या खोया अब समझे हैं 
ज्ञान समझ कर जितना सीखा, उतना मैला हो गया दर्पण  
जिन स्वप्नों से अपने छूटे अब उन पर अधिकार नहीं है
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।

जो आये कुछ लेने आये, क्या अपने और क्या अनजाने 
दे डाला जो दे सकता था, रिक्त हो 
गया मेरा जीवन 
कदम रुके तो देख रहा हूँ  देश दिशा हर द्वार अपरिचित
सुबह का भूला लौट रहा हूँ, बुला रहा है घर का आंगन    
शोर बहुत है अंतर्मन में, सरल सरस झंकार नहीं है
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।

द्यूत बिछा है कालचक्र का, फेंक रहा हूँ नियति के पासे
अभिलाषा के रेतमहल पर, कल से लड़ती आज की सांसे
भटक भटक कर मृगतृष्णा में, स्वप्नों से है अंतहीन रण
दीप्त हो रहा मुक्ति मार्ग, अब छंटने को है सूर्यग्रहण 
रक्तबीज हैं इच्छाओं के, ध्वंश बिना उद्धार नहीं है
खुला निमंत्रण मुक्त गगन का, अब रुकना स्वीकार नही है।






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