वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो

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photo credit: vecteezy



सच्चाई का जुनूं है तो बेहतर अकेले चलना सीख लो
ज़िंदगी इबादत की आग है बेख़ौफ़ जलना सीख लो
गुजर चुके लम्हों में दिल की धड़कनें ना क़ैद हो जायें
ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो 

ना तुम रुकना चाहते हो ना हमे ठहरने का शौक़ है मगर
कहीं तो ये क़ाफ़िला रुकेगा एक दिन आहिस्ता आहिस्ता
भला कब तक रहेगी आसमाँ में रोशनी की चकाचौंध
कभी ना कभी तो दिन ढल जाएगा, आहिस्ता आहिस्ता

ये ज़िद किस काम की अब उतर के आ जाओ जमीं पर
एक खूबसूरत शाम की तरह तुम भी ढलना सीख लो
ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो 

वक़्त के सैलाब में बिखरते रिश्तों की अहमियत देख ली
दरवाज़ा खटखटाने वालों की नीयत देख ली
गले में उतरते नमकीन आंसू तो कभी दिखायी नहीं देते
मगर दिखने वाली मुस्कुराहटों की असलियत देख ली

इससे पहले कि दफ़्न हो जाएं जज़्बात इन चहार दीवारियों में
दुनिया तुम्हारी है ऐ दोस्त, घर से बाहर निकलना सीख लो
ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो 

आख़िर ये तक़दीर बदलने की इतनी जद्दोज़हद क्या है
ख़ुद से पूछो तो कभी तुम्हारे जुनूं की आख़िर हद क्या है
बड़े नसीब से मिलती है इस रूह को इंसान की ज़िंदगी
किसी को इल्म नहीं की इन साँसों का मक़सद क्या है

ना ठोकरें कम होंगी ना ही कारवाँ रुकेगा तुम्हारी ख़ातिर
मायूस होने से बेहतर है अब ख़ुद ही संभलना सीख लो
ज़िंदा हो तो वक़्त के साथ ख़ुद को बदलना सीख लो

- Rakesh

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