सवाल उम्र भर के लिए
इन्ही पन्नों में इन्ही किस्सों में उन दिनों जवान होती
हमारी समझ से परे ऐसा भी एक भी हिस्सा
जहाँ हर जवाब बस एक सवाल बन के रह गया
जहाँ फलसफ़े की रोशनी में नहा के
ज़िन्दगी अंधेरों से ज्यादा काली दिखने लगी
और हर यकीन सिर्फ एक ख़याल बन के रह गया
वो भी तो दोस्त था, वो भी था हमसफ़र
तमाम और लोगों सा, वक़्त से जूझता उधेड़ता बुनता
किताबों, इम्तहानों, कैंटीन, लाइब्रेरी और
वक़्त बेवक़्त की मटरग़श्तियों में यहाँ-वहाँ
शायद कुछ कम कहता मगर सबकी सुनता
पर हमें क्या पता कि उम्मीदों के इस मंदिर में भी
किन खयालों के दाँव-पेंच से वो मज़बूर हो गया
दोस्ती और दुनियादारी के दायरों से आगे
साथ रह के भी न जाने कब इतना दूर हो गया
हम अपने सपनों को ज़िन्दगी समझते रहे
और वो ज़िन्दगी को फ़िज़ूल का सपना
हमारी जद्दोजहद थी सफ़र शुरू करने की
और उसका जुनून बन गया सफ़र खत्म करना
साथ बैठे, वक़्त गुजारा, तहे दिल से कोशिश की
समझने और समझाने में कुछ और वक़्त बीत गया
हमारे सब फलसफे हार गए
आखिर एक दिन उसका जुनून जीत गया
उस रोज आई आई टी में फिर से
एक और सांस ज़िन्दगी के हाथों से फिसल गई
एक बार फिर अपने जवाबों की तलाश करते करते
किसी की तलाश एक उम्र भर के सवाल में बदल गयी
- Rakesh
PS: We had an unfortunate incident of suicide in my IIT hostel, someone very close, a fellow student wing-mate in the room next to mine. This poetry is dedicated to my dear friend who lost the battle of life.
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